क्रांति दिवस विशेष: आज ही के दिन भड़की थी ब्रिटिश राज के खिलाफ आजादी की चिंगारी|NewsRedbull

Picture Courtesy From Social Media : भारत के इतिहास में 10 मई 1857 एक खास दिन के रूप में दर्ज है. यही वो दिन था जब आजादी की चिंगारी विस्फोट बनकर अंग्रेजों के सामने आई और ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत पर पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती चली.

By : News RedBull | Published On: May 10, 2020 |
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क्रांति दिवस विशेष: आज ही के दिन भड़की थी ब्रिटिश राज के खिलाफ आजादी की चिंगारी|NewsRedbull

नई दिल्ली: Online Desk NewsRedbull// भारत के इतिहास में 10 मई 1857 एक खास दिन के रूप में दर्ज है. यही वो दिन था जब आजादी की चिंगारी विस्फोट बनकर अंग्रेजों के सामने आई और ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत पर पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती चली. यूं तो इस क्रांति की शुरुआत मेरठ से एक सैन्य विद्रोह के तौर पर हुई, लेकिन समय के साथ यह बिर्टिश शासन के खिलाफ जनव्यापी विद्रोह बन गया और अंततः अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश होना पड़ा. 

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आजादी की इस चिंगारी को आग बनाने में मंगल पांडे की अहम भूमिका रही, जिन्होंने सबसे पहले चर्बी वाले कारतूसों के इस्तेमाल से इनकार करने का साहस दिखाया. दरअसल, भारत में तैनात ब्रिटिश सेना में 87 फ़ीसदी के आसपास भारतीय सैनिक थे.

वे लंबे समय से अपने खिलाफ होने वाले भेदभाव को लेकर नाराज चल रहे थे, लेकिन अंग्रेज हुकूमत के सामने कोई बगावत करना नहीं चाहता था. लेकिन 1857 तक आते-आते उनका गुस्सा ज्वाला का रूप ले चुका था और उसे सिर्फ एक चिंगारी की जरूरत थी.

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भारतीय सैनिकों को ऐसी राइफलें उपलब्ध कराई गई थीं, जिनमें इस्तेमाल होने वाले कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी होती थी. इन कारतूसों के खोल को मुंह से खींचकर निकालना होता था, जिसके लिए सैनिक तैयार नहीं थे. हिंदू और मुस्लिमों ने इन कारतूसों के प्रयोग को धार्मिक भावनाओं के खिलाफ करार देना शुरू कर दिया था. 

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25 मार्च को इन कारतूसों को लेकर मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में अंग्रेज अफसरों के खिलाफ विद्रोह किया, इसके बाद मेरठ में तीसरी इन्फेंट्री के 85 सिपाही भी बगावत कर बैठे. मगर अंग्रेजों के लिए उस विद्रोह को दबाना ज्यादा मुश्किल नहीं रहा. 8 अप्रैल को मंगल पांडे को फांसी पर चढ़ा दिया गया. इसके बाद 9 मई को परेड ग्राउंड पर मेरठ की तीनों रेजिमेंट के सामने कारतूस लेने से इनकार करने वाले सैनिकों का कोर्ट मार्शल किया गया और उन्हें विक्टोरिया पार्क में बनी जेल में बंद कर दिया.'

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सार्वजानिक रूप से ऐसा इसलिए किया गया ताकि फिर कोई आदेश मानने से इनकार न कर पाए, लेकिन इससे सैनिकों का गुस्सा भड़क उठा. 10 मई को उन्होंने जेल पर धावा बोलकर अपने सभी साथियों को मुक्त कराया और कई अफसरों को मौत के घाट उतारा. इसके बाद मेरठ की तीनों रेजिमेंट के बहादुर सिपाहियों ने बगावत का झंडा उठाया और दिल्ली के लिए निकल पड़े.

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11 मई की सुबह तक दिल्ली में क्रांतिकारियों की फौज जमा हो चुकी थी. ‘मारी फिरंगी, मारो’ के नारे जब दिल्ली में गूंजना शुरू हुए, तो अंग्रेज हुकूमत के पैरों तले जमीन खिसक गई.

क्रांतिकारियों ने 14 मई को दिल्ली पर कब्जा जमाया और मुगल बादशाह बहादुरशाह को दिल्ली का सम्राट घोषित किया गया. दिल्ली में सफलता को देखते हुए विद्रोह की आग देश के अन्य हिस्सों में भी फैल गई.

 

हालांकि, 21 सितंबर को अंग्रेजों ने एक बार फिर से दिल्ली को अपना बना लिया. लेकिन आजादी के नारे मंद पड़ने के बजाये और बुलंद होते गए. 1858 में ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को समाप्त किया और भारत पर शासन का अधिकार महारानी विक्टोरिया को सौंपा गया.

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इस बीच, अंग्रेजों ने भरसक प्रयास किया कि भारत में उठती आजादी की मांग को हमेशा के लिए दबा दिया जाए, मगर वह सफल नहीं हो सके और आखिरकार हमें 1947 को अंग्रेज शासन से आजादी मिल सकी. 1857 का विद्रोह भारत के लिए इसलिए भी खास रहा, क्योंकि आजादी की लड़ाई की शुरुआत सही मायनों में यहीं से हुई.

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