विश्लेषण: त्रिपुरा में क्‍यों लहराया भगवा और पूर्वोत्तर की उपेक्षा कांग्रेस को कैसे पड़ी भारी |NewsRedbull

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By : News RedBull | Published On: Mar 05, 2018 |
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विश्लेषण: त्रिपुरा में क्‍यों लहराया भगवा और पूर्वोत्तर की उपेक्षा कांग्रेस को कैसे पड़ी भारी |NewsRedbull

 विपक्ष को समझना होगा कि चुनावों से पहले समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन कर भाजपा को चुनौती नहीं दी जा सकती। विपक्ष को जनता और उनके मुद्दों से जुड़ना होगा लेकिन 2019 के आम चुनावों को देखते हुए लगता है कि अब उसके लिए भी समय नहीं बचा है।  त्रिपुरा में 25 साल पुराना 'लाल' किला ढह गया। त्रिपुरा के साथ-साथ पूर्वोत्‍तर के दो अन्‍य राज्‍य नगालैंड और मेघालय में भी विधानसभा चुनाव संपन्‍न हुए, जिसके नतीजे केंद्र में सत्‍तारूढ बीजेपी के लिए जहां उत्‍साह बढ़ाने वाला है, वहीं कांग्रेस के लिए मनोबल गिराने वाला है, जो आगामी 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को टक्‍कर देने की सोच रही है। 

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सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने पूर्वोत्तर को नजरंदाज किया और आज उसे यह कीमत चुकानी पड़ी है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह असम से दो बार राज्यसभा सदस्य रहे इस दौरान वह चाहती तो असम सहित पूरे पूर्वोत्तर के राज्यों का काया पलट कर सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। अब यह काम भाजपा कर रही है और इसका लाभ भी उसे पहुंचता दिख रहा है। अब देश में बीजेपी या उसके गठबंधन दलों द्वारा शासित राज्‍यों की संख्‍या 21 हो गई है, जहां देश की करीब 70 फीसदी आबादी बसती है। देश की राजनीति में यह स्थिति 1990 के दशक की शुरुआत में थी, जब विभिन्‍न राज्‍यों में कांग्रेस का बोलबाला था। 1993 के आखिर तक देश में के 15 राज्‍यों में कांग्रेस की सरकार थी, जबकि एक अन्‍य राज्‍य में उसकी गठबंधन सरकार थी। पर आज स्थिति बिल्‍कुल अलग है। 

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यह स्थिति कांग्रेस के लिए भी आंखें खोलने वाली है, क्‍योंकि त्रिपुरा के चुनाव में उसने जहां अपनी सभी 10 सीटें गंवाईं, वहीं उसका वोट प्रतिशत भी 2013 के विधानसभा चुनाव के 36.53 प्रतिशत के वोटों से खिसकर दो प्रतिशत से भी कम रह गया।  यूं तो 2018 का यह बड़ा जनादेश पूर्वोत्‍तर के तीन राज्‍यों से आया है, पर राजनीति में रुचि रखने वाले देशभर लोगों और पर्यवेक्षकों की नजर त्रिपुरा पर खास रही, जहां 25 साल पुरानी वामपंथी सरकार धराशायी हो गई। लेफ्ट को इस चुनाव में महज 16 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी जो 2013 के विधानसभा चुनाव में कहीं नहीं थी, ने 60 सदस्‍यीय विधानसभा, जिनमें से 59 सीटों पर ही वोट डाले गए, में लगभग दो तिहाई सीटें जीतते हुए गठबंधन साझीदार Indigenous People's Front of Tripura (IPFT) साथ मिलकर 43 विधानसभा क्षेत्रों में जीत दर्ज की। त्रिपुरा ही नहीं, मेघालय और नगालैंड में भी बीजेपी ने स्‍थानीयता व क्षेत्रीयता की पहचान को लेकर संघर्षरत समूहों के साथ हाथ मिलाया और उन्‍हें पहचान दी।

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 सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने पूर्वोत्तर को नजरंदाज किया और आज उसे यह कीमत चुकानी पड़ी है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह असम से दो बार राज्यसभा सदस्य रहे इस दौरान वह चाहती तो असम सहित पूरे पूर्वोत्तर के राज्यों का काया पलट कर सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। अब यह काम भाजपा कर रही है और इसका लाभ भी उसे पहुंचता दिख रहा है। अब देश में बीजेपी या उसके गठबंधन दलों द्वारा शासित राज्‍यों की संख्‍या 21 हो गई है, जहां देश की करीब 70 फीसदी आबादी बसती है। देश की राजनीति में यह स्थिति 1990 के दशक की शुरुआत में थी, जब विभिन्‍न राज्‍यों में कांग्रेस का बोलबाला था। 

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कहा जा सकता है कि बीजेपी ने यहां जो लाइन अपनाई, वह पूरे देश में उसके हिन्‍दुत्‍व की लाइन से बिल्‍कुल अलग है। त्रिपुरा में जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भाजपा और आरएसएस ने पिछले कुछ वर्षों में काफी मेहनत की। आरएसएस ने त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों में माणिक सरकार की नाकामियों को उजागर करता रही और भाजपा इस दौरान ब्लाक, तहसील और जिले स्तर पर अपने सांगठनिक ढांचे को मजबूत किया और जब चुनाव प्रचार की बारी आई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ सहित केंद्रीय मंत्रियों और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने धुआंधार प्रचार किया। त्रिपुरा में जीत के दूरगामी राजनीतिक मायने हैं, यह जानते हुए भाजपा ने अपने चुनाव-प्रचार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। राज्य में जिस नेता का असर हो सकता था उसे चुनाव प्रचार में लगाया। यह बात योगी आदित्यनाथ के चुनावी सभाओं से समझी जा सकती है।

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