कोरेगांव भीमा की लड़ाई: 834 महार और 28000 सवर्ण,जानिए दलित क्यों मनाते हैं 1 जनवरी को 'विजय दिवस'

1 जनवरी 1818 में कोरेगांव भीमा की लड़ाई में पेशवा बाजीराव द्वितीय पर अंग्रेजों ने जीत दर्ज की थी. जीत के स्मरण में विजय स्तंभ का निर्माण कराया था, जो दलितों का प्रतीक बन गया. हर साल 1 जनवरी को हजारों दलित लोग श्रद्धाजंलि देने यहां आते हैं.

By : News RedBull | Published On: Jan 03, 2018 |
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कोरेगांव भीमा की लड़ाई: 834 महार और 28000 सवर्ण,जानिए दलित क्यों मनाते हैं 1 जनवरी को 'विजय दिवस'

 बता दें, वर्ष 1818 में हुआ भीमा-कोरेगांव युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तथा तथाकथित सवर्ण पेशवा सैनिकों के बीच हुआ था, जिसमें पेशवाओं की हार हुई थी, और अंग्रेज़ों की फौज में दलित सैनिक थे.दलित इसी युद्ध की वर्षगांठ को 'विजय दिवस' के रूप में मनाते हैं. बता दें, 1 जनवरी 1818 में कोरेगांव भीमा की लड़ाई में पेशवा बाजीराव द्वितीय पर अंग्रेजों ने जीत दर्ज की थी. जीत के स्मरण में विजय स्तंभ का निर्माण कराया था, जो दलितों का प्रतीक बन गया.
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 हर साल 1 जनवरी को हजारों दलित लोग श्रद्धाजंलि देने यहां आते हैं.  बताया गया है कि अंग्रेज़ों की जीत पर मनाए जा रहे जश्न का ही सोमवार को एक गुट द्वारा विरोध किया गया था, जिसके बाद हिंसा भड़की. मामले पर महाराष्ट्र के मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कह चुके हैं कि कोरेगांव हिंसा की न्यायिक जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी जाएगी. युवाओं की मौत के मामले में सीआईडी जांच करेगी, और मृतकों के परिवार को 10 लाख का मुआवजा दिया जाएगा.
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कोरेगाँव की लड़ाई १ जनवरी १८१८ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के पेशवा गुट के बीच, कोरेगाँव भीमा में लड़ी गई।

बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में २८ हजार मराठों को पुणे पर आक्रमण करना था। रास्ते में उनका सामना कंपनी की सैन्य शक्ति को मजबूत करने पुणे जा रही एक ८०० सैनिकों की टुकड़ी से हो गया। पेशवा ने कोरेगाँव में तैनात इस कंपनी बल पर हमला करने के लिए २ हजार सैनिक भेजे। कप्तान फ्रांसिस स्टौण्टन के नेतृत्व में कंपनी के सैनिक लगभग १२ घंटे तक डटे रहे। अन्ततः जनरल जोसेफ स्मिथ की अगुवाई में एक बड़ी ब्रिटिश सेना के आगमन की संभावना के कारण मराठा सैन्यदल पीछे हट गए। अंग्रेजो की फूट डालो और राज करो की नीति का ये एक और उदाहरण था। भारतीय मूल के कंपनी सैनिकों में मुख्य रूप से बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री से संबंधित महार रेजिमेंट के सैनिक शामिल थे, और इसलिए महार लोग इस युद्ध को अपने इतिहास का एक वीरतापूर्ण प्रकरण मानते हैं।


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महारों का महत्व

कोरेगांव स्तंभ शिलालेख में लड़ाई में मारे गए 49 कंपनी सैनिकों के नाम शामिल हैं। इन 22 नामों को प्रत्यय-एनएसी (या -नाक) के साथ समाप्त होता है, जो कि महार जाति के लोगों द्वारा विशेष रूप से उपयोग किया जाता था।  भारतीय स्वतंत्रता तक यह ओबिलिस्क महार रेजिमेंट के शिखर पर चित्रित किया जाता रहा। हालांकि यह ब्रिटिश द्वारा अपनी शक्ति के प्रतीक के रूप में बनाया गया था, आज यह महारों के स्मारक के रूप में कार्य करता है। 

हालांकि वर्तमान में ऊंची जाति पेशवाओं पर निचली जाति की जीत के रूप में चित्रित किया जाता है, किन्तु यह भी तथ्य है कि महारों ने शिवाजी, राजाराम और पेशवा शासकों सहित मराठा राज्यों के लिए लड़ाईयाँ लड़ी थीं। उदाहरण के लिए, नागाराम महाराज राजाराम के शासन में प्रमुख थे, रेनाक महार ने रायगढ़ और शिद्क्क महाराज को हराया था और 17 9 5 में खर्दा की लड़ाई के दौरान पेशवा जनरल परशुराम पटवर्धन के जीवन को बचाया था। महार रेजिमेंट भारतीय सेना का एक इन्फैन्ट्री रेजिमेंट है। यद्यपि मूलतः इसे महाराष्ट्र के महार सैनिकों को मिलाकर बनाने का विचार था, किन्तु केवल यही भारतीय सेना का एकमात्र रेजिमेन्ट है जिसे भारत के सभी समुदायों और क्षेत्रों के सैनिकों को मिलाकर बनाया गया है।

ऐतिहासिक रूप से, हिन्दू जाति द्वारा महारों को अस्पृश्यता अस्पष्ट समुदाय माना जाता था हालांकि, वे अधिकतर अछूत समूहों के ऊपर सामाजिक-आर्थिक रूप से अच्छी तरह से थे, क्योंकि गांव प्रशासनिक व्यवस्था में उनकी पारंपरिक भूमिका महत्वपूर्ण थी, उन्हें जरूरी हुआ कि वे कम से कम एक अल्पकालिक शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं और अक्सर उन्हें ऊपरी जाति हिंदुओं के संपर्क में लाते हैं।

इन सेवाओं के बदले, गांव ने उन्हें अपनी खेती करने के लिए उन्हें छोटे से जमीन के अधिकार दिए। वतन में गांव के उत्पादन का हिस्सा भी शामिल था।

तिथि१ जनवरी १८१८
स्थानभीमा कोरेगांव (अब महाराष्ट्रभारत)
18°38′44″N 074°03′33″Eनिर्देशांक18°38′44″N 074°03′33″E
परिणामब्रिटिश सेना की जीत, पेशवाओं की पराजय
योद्धा
British East India Company flag.svg ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनीFlag of the Maratha Empire.svg मराठा साम्राज्य का पेशवा गुट
सेनानायक
कैप्टन फ्रांसिस एफ॰ स्टोंटनपेशवा बाजीराव द्वितीय
बापू गोखले
अप्पा देसाई
त्रिम्बक जी देंगले
शक्ति/क्षमता
834, जिसमे लगभग 500 की पैदल सेना, 300 के आसपास घुड़सवार और 24 तोपें
2-6 पाऊंडर तोपें
28000, जिसमें लगभग 20,000 घुड़सवार और 8000 पैदल सेना
(जिसमें 2,000 ने भाग लिया)
मृत्यु एवं हानि
275 मृत्यु, घायल या लापता500–600 मृत्यु या घायल (ब्रिटिश अनुमान)

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